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    रचना - ऋषिशेष



    ऋषिशेष उवाचः रचना

    क्यो कहलाह निधि महान छथि
    क्यो दिन(राति करैत गुनगान छै ।
    जाबति धरि ओ कुर्सी पर रहता
    सगरे हुनके देखू जयगान छै ।।

    जनकपुर बनल हे मुर्दाक शहर
    जनक नन्दनी मात्र जानि रहल ।
    राम मन्दिर दिस ध्यान सँ देखू
    छाता ओढि राम कानि रहल ।।

    दैव आर दानव संगे किछु मानव
    सबक्यो भिडल अछि लुट मे विदेह ।
    संस्कार हराओल, संस्कृति विलय
    नौलखा मन्दिर सँ मुदा अछि सिनेह ।।
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    Item Reviewed: रचना - ऋषिशेष Rating: 5 Reviewed By: Shesh Narayan Jha
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